वामपंथियों का भगत सिंह पर दावा खोखला


भगत सिंह को लेकर वामपंथियों या साम्यवादियों की दावेदारी और उनका यह कहना कि दक्षिणपंथियों को भगत सिंह से ख़ुद को जोड़ने का कोई हक़ नहीं है, मेरे ख़्याल से बिल्कुल अनर्गल और निराधार है.
भगत सिंह की एक मात्र विचारधारा प्रखर देखभक्ति और भारत की स्वतंत्रता थी.
भगत सिंह की विचारधारा को समझने के लिए ध्यान रखना चाहिए कि उनकी शहादत के वक्त उनकी उम्र क्या थी और देश-दुनिया की परिस्थितियाँ कैसी थीं.
भगत सिंह 1926 के आसपास समाजवादी विचारधारा और उसके साहित्य के क़रीब आए. उन दिनों देश में समाजवादी विचारधारा की काफ़ी चर्चा हो रही थी.
उन्हीं दिनों के बारे में चर्चा करते हुए क्रांतिकारी सचिंद्रनाथ सान्याल जो कि हिंदुस्तान रिपब्लिकन पार्टी के संस्थापक थे, ने अपनी किताब विचार विनिमय में लिखा है कि जब मैं अंडमन की जेल से छूटकर आया तो मैंने पाया कि समाजवाद की चर्चा तो बहुत हो रही है पर इसका कोई अध्ययन करने वाला मुझे नहीं मिला.
रूस का प्रचार
यह वही दौर था जब रूस की ओर से एक ज़ोरदार प्रचार की आंधी चल रही थी कि रूस की धरती पर मजदूरों के लिए एक स्वर्ग क़ायम हो गया है और वहाँ एक शोषणविहीन और समतामूलक समाज की स्थापना हो गई है.
इसकी सच्चाई से तो कोई वाकिफ़ था नहीं पर इतना ज़रूर था कि नौजवान इस प्रचार से काफ़ी प्रभावित थे. उन्हें समतामूलक समाज का विचार उन्हें बहुत प्रभावित करता था.
सचिंद्रनाथ सान्याल के जरिए ही भगत सिंह 1924 में क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े थे. क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ने के बाद भी इस बात के प्रमाण हैं कि भगत सिंह 1928 तक आर्यसमाज से जुड़े रहे. वो 1928 में जब कलकत्ता गए तो आर्यसमाज में ही रुके थे.
इस दौरान समाजवादी विचारधारा लोकप्रिय थी इसलिए भगत सिंह ने उसे जानने का प्रयास ज़रूर किया पर इसका यह मतलब नहीं कि वो समाजवादी हो गए थे या कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता हो गए थे.
वामपंथियों ने यह झूठा प्रचार किया है कि भगत सिंह उनकी विचारधारा के थे या उनसे जुड़े थे और इसका उनके पास कोई आधार भी नहीं है.
नास्तिक होने का मतलब...
भगत सिंह ने 1930 में जेल में रहते हुए एक लेख लिखा- मैं नास्तिक क्यों हूँ. हाँ, मगर उनके नास्तिक होने का मार्क्सवाद या समाजवाद से कोई संबंध नहीं था.
उन्होंने किसी दार्शनिक आधार पर ख़ुद को नास्तिक नहीं बताया था. भगत सिंह नेशनल कॉलेज, लाहौर के तत्कालीन प्रिंसिपल छबीलदास से संपर्क में थे. छबीलदास नास्तिक हो गए थे. ऐसी ही कुछ बातों से भगत सिंह का भावुक युवा मन भी प्रभावित हुआ होगा जिसके कारण वो नास्तिक हो गए थे.
भगत सिंह की एक नोटबुक है जो उन्होंने जेल में लिखी है. इस नोटबुक में भगत सिंह ने उन पुस्तकों के नोट्स लिए हैं जिनको वो जेल में रहते हुए पढ़ रहे थे. इन नोट्स के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि वो उस विचारधारा से सहमत थे जिसके बारे में उन्होंने नोट्स लिए.
भगत सिंह की शहादत की खूँटी पर वामपंथी अपनी मुर्दा विचारधारा की लाश लटकाने की कोशिश कर रहे हैं.
दरअसल, वामपंथी भगत सिंह की शहादत को आज भी भुनाना चाहते हैं ताकि उनकी लगभग मर चुकी विचारधारा और पार्टी में फिर से कुछ दमखम आ सके.

दोहरे मानदंड का दुर्लभ नमूना

किसी शपथपत्र और कार्टून में समानता खोजना मुश्किल कार्य है, लेकिन ये दोनों बिलकुल अलग-अलग चीजें किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम किस तरह लगभग समान रूप से कर सकती हैं, इसका उदाहरण है कुछ समय पहले डेनमार्क के समाचार पत्र में छपा एक कार्टून और पिछले सप्ताह उच्चतम न्यायालय में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से पेश किया गया शपथपत्र। डेनमार्क के अखबार में छपे कार्टून ने जहां दुनिया भर के मुसलिम समुदाय को नाराज किया था वहीं पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के शपथपत्र ने हिंदू समुदाय को क्षुब्ध किया। संभवत: इससे सभी अवगत हैं कि उस विवादास्पद कार्टून के छपने के बाद भारत समेत दुनिया भर के अन्य देशों में क्या हुआ था, लेकिन शपथपत्र के सिलसिले में सरकार द्वारा माफी मांगने से इनकार किए जाने के बाद यह स्मरण करना जरूरी हो जाता है कि उस समय हमारी सरकार की क्या प्रतिक्रिया थी? यह जानने के लिए सबसे पहले पढ़ते हैं 11 फरवरी 2006 का एक समाचार। नई दिल्ली,11 फरवरी। पैगंबर मुहम्मद के कार्टूनों को लेकर दुनिया भर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच भारत ने आज इस पूरे घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त करते हुए आधिकारिक रूप से कहा कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली गतिविधियों से परहेज किया जाना चाहिए। सरकार के एक प्रवक्ता ने यहां कहा कि भारत सरकार मुस्लिम समुदाय को आहत करने वाले कार्टूनों के कारण गहराते विवाद से बहुत चिंतित है। उन्होंने कहा कि जब ये कार्टून अक्टूबर 2005 में पहली बार प्रकाशित किए गए थे तभी भारत ने इन पर आपत्ति का इजहार डेनमार्क सरकार के सामने कर दिया था। सरकार ने कोपेनहेगेन को सुझाव दिया था कि इन कार्टूनों को प्रकाशित करनेवाले अखबार से माफी मांगने के लिए कहा जाए और वह अखबार आश्वासन दे कि उनका पुन‌र्प्रकाशन नहीं किया जाएगा। इस समाचार में यह स्पष्ट नहीं कि प्रवक्ता की भूमिका में कौन था, लेकिन प्रवक्ता का नाम जानने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि संप्रग सरकार ने इस मामले को कितनी गंभीरता से लिया? इसी सिलसिले में एक अन्य समाचार का संज्ञान लेना भी आवश्यक है। यह समाचार 22 फरवरी का है। यद्यपि इस समाचार की कुछ बातें वही हैं जो सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता ने कही थीं, फिर भी पूरा समाचार पढ़ने में हर्ज नहीं। नई दिल्ली, 22 फरवरी।
डेनमार्क के एक अखबार में प्रकाशित पैगंबर मुहम्मद के आपत्तिजनक कार्टून को लेकर दुनिया भर में चल रहे विवाद के बारे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज कहा कि सरकार इस प्रकार की घटनाओं की घोर निंदा करती है। उन्होंने सामाजिक तथा धार्मिक नेताओं से इस मामले में संयमित व्यवहार करने की अपील की। राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का समापन करते हुए प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में कहा कि सरकार ने पिछले साल अक्टूबर माह में ही डेनमार्क सरकार के समक्ष नई दिल्ली और कोपेनहेगन, दोनों जगह अपना विरोध दर्ज करा दिया था। उन्होंने कहा कि भारत ने डेनमार्क सरकार से कहा कि वह संबद्घ अखबार से माफी मांगने के लिए कहे। श्री सिंह ने कहा कि सरकार ऐसे सभी कृत्यों की भ‌र्त्सना करती है जिससे किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस लगे। उन्होंने सभी सामाजिक और धार्मिक नेताओं से अपील की कि वे इस प्रकार के संवेदनशील मुद्दों पर लोकतंत्र की सीमा के भीतर संयमित व्यवहार करें। यदि प्रधानमंत्री को अपनी सरकार के प्रवक्ता की कुछ बातें राज्यसभा में भी दोहरानी पड़ें तो इसका मतलब है कि उनकी नजर में वह मामला बहुत गंभीर रहा होगा। खास बात यह है कि 23 फरवरी को उन्होंने लोकसभा में भी कार्टून विवाद पर अपनी सरकार के रवैये और अपनी चिंता का इजहार किया था। क्या किसी ने रामसेतु पर पेश किए गए शपथपत्र के संदर्भ में सरकार के किसी व्यक्ति-यहां तक कि अनाम प्रवक्ता के मुख से भी, यह सुना कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली गतिविधियों से परहेज किया जाना चाहिए? क्या सरकार और उसका नेतृत्व करने वाली कांग्रेस के किसी प्रवक्ता- यहां तक कि अनाम प्रवक्ता ही सही-ने घोर निंदा, भ‌र्त्सना या माफी जैसा शब्द इस्तेमाल किया? नि:संदेह विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज ने शपथपत्र मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की गलती मानी, लेकिन क्या गलती के बाद क्षमा मांगना जरूरी नहीं? क्या यह ऐसी गलती है जिस पर क्षमा की जरूरत नहीं? हमारे देश का सामान्य शिष्टाचार तो यह कहता है कि तनिक सी भी गलती पर माफी मांग ली जाए, लेकिन भारत सरकार का एक विभाग और एक मंत्रालय भयानक गलती शपथपत्र देकर करता है और फिर भी माफी मांगने से परहेज किया जाता है।
आखिर क्यों? चूंकि कोई भी इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए तैयार नहीं इसलिए जनता के पास अनुमान लगाने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं रह जाता? एक अनुमान तो यह कहता है कि सरकार की नजर में यह ऐसी मामूली गलती रही होगी जिस पर क्षमा मांगने की कोई जरूरत ही नहीं। दूसरा अनुमान यह कहता है कि मामला हिंदू समुदाय से संबंधित होने के नाते सरकार को शायद यह महसूस हो रहा होगा कि माफी मांगने से कहीं उसकी पंथनिरपेक्ष छवि न धूमिल हो जाए या फिर कोई ऐसा संदेश न चला जाए कि वह बहुसंख्यक समुदाय के समक्ष झुक गई। तीसरा अनुमान यह इंगित करता है कि सरकार करुणानिधि के कोप का भाजन नहीं बनना चाहती होगी, जिन्होंने शपथपत्र की वापसी के बाद यह कहा कि वह तो सही था और हम ऐसी कहानियां नहीं चलने देंगे। करुणानिधि के इस बयान पर केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने फरमाया है कि लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है। ठीक इसी तर्ज पर जनता को अनुमान के मुताबिक निष्कर्ष निकालने का अधिकार तो दिया ही जाना चाहिए और यदि वह यह मानती है कि संप्रग सरकार बहुसंख्यक समाज की अनदेखी करती है तो क्या उसे दोष दिया जा सकता है?

Islam,Terrorism and Hindustan -- why Hindus should start 'Dharma Yuddha'

By : - Nithin.S

Whenever a Terrorist attack takes place, the Muslim community is looked upon suspision.This is because, the most of the terrorist attacks are done by the Jehadi Mujahidins of Islam. Bharath, that is India is the worst victim of this Islamic aggression and terrorism,for past 1000 years.The only other country that has faced these is Israil. Still, Hindus love to maintain their image of Non-Violence.But,the recent attack is again indicating, that our Inaction is not going to solve the problem.The Pseudo-Secularists in India may try to portray that this is in reaction to the Gujarath riots or Babri Masjid Demolition.They may even say that RSS/BJP/VHP did this.But, I ask them was their a Gujarath riots in USA, was their any RSS in Russia or any where in this world where innocent people are being targeted by Islamic terrorists,such as Palastienians or Chechynyans or Kashmiris? The great secular govt Congress uunder the Italian Sonia, removed the POTA[Prevention od terrorism act]. just because, it was introduced by BJP.These type of Minority appeasement and selffishness will only increase the confidence of Terrorists.

WHY TERRORISTS ARE THE TRUE FOLLOWERS OF ISLAM
To understand terrorism, we need to go deeper.It is not coincidence that, all the people involved in the terrorism are Muslims.Most of the Muslims claim that, Islam is peacefull, but the terrorists are spoinling the Islam, many claim that there is no religion for terrorists.But, this claim fails when we just look at the basic preachings of Islam.Mohammud divided the world into 2 parts-
1. Darul-harab[land of Non-believers]
2. Darul-Islam[land of believers of islam]

Islam calls the Non -believers as Khafirs, and orders that every true Muslim should start Jihad, to turn Darul-harab into Ddarul-Islam, by either killing or converting the Khafirs.
Koran says- XCVIII/6: Lo! those who disbelieve, among the people of the Scripture and idolaters, will abide in fire of hell. They are the worst of created beings.
XLIV/43-50: LO! the tree of Zaqqum (The tree that grows in the heart of hell bearing fruits like devil's heads) - the food of the sinner. Like molten brass, it seetheth in their bellies as the seething of boiling water. (And it will be said): Take him and drag him to the midst of hell, then pour upon his head the torment of boiling water. Saying: TASTE! LO! thou wast forsooth the mighty, the noble! Lo! this is that whereof ye used to doubt.
Koran 9:71 “O Prophet, strive hard [fighting] against the unbelievers and the Hypocrites, and be harsh with them. Their abode is Hell, an evil refuge indeed.”
Koran 8:59 “The infidels should not think that they can get away from us. Prepare against them whatever arms and weaponry you can muster so that you may terrorize them.”
Koran 8:12 “I will terrorize the unbelievers. Therefore smite them on their necks and every joint and incapacitate them. Strike off their heads and cut off each of their fingers and toes.” Koran 8:13 “This because they rejected Allah and defied His Messenger. If anyone opposes Allah and His Messenger, Allah shall be severe in punishment. That is the torment: ‘So taste the punishment. For those infidels who resist there is the torment of Hell.’”
These some quotes will show what Islam directs Muslims to Do.Today, many of the common Muslims are peaceful because, they do not no the Islam properly.The Terrorists on other hand follows blindly what Islam says to them.Therefore they are the true Muslims.The problem is not with the Muslims but with the Principles of the Islam.

WHAT HINDUS[Indians] NEED TO DO?
It is a known fact that, the goal of terrorists is to make India a Pakistan.They are not concerned about Kashmir, but their agenda is to Islamise Hindustan.Pakistan for these reasons is not only sheltering Terrorists, but it is providing all types of supports,both monetary and military.There can be no peace in India until Pakistan is there, until a part of Kashmir is with Pakistan.There is only one solution, India should occupy the POK[Pak occupied Kashmir] and kill all the terrorists and then clise down all their camps. But this does not end here, Pakistan should be cautioned that if it does not stop this proxy war, it will have to face a Nuclear War. The time has come when all Hindus to become Kshtriyas and to start a 'Dharma Yuddha', To save Dharma[Rightioussness], to save Hindus, to save Hinduism, to save Hindustan.

किसी भी इतिहास से बड़े हैं श्रीराम

कर्ण सिंह

हमारे राष्ट्र की झोली में मानो पहले ही विवादों की कोई कमी थी, जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने एक और मुद्दा जोड़ दिया। हमारे चारों ओर मौजूद भ्रम एवं तनाव इससे और भी बढ़ गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस बारे में अपनी राय कायम कर सकता था कि राम सेतु या आदम पुल बालू तथा मूंगे से बनी एक कुदरती संरचना है, जिसे ऐतिहासिक, पुरातात्विक या कलात्मक महत्व का नहीं कहा जा सकता। यह एक तार्किक नजरिया है, जिसे केवल इतने ही मजबूत पेशेवर जवाबी तर्क से निरस्त किया जा सकता है। लेकिन पुरातत्व विभाग ने तो इससे परे जाकर राष्ट्र को स्तब्ध कर दिया। उसने ऐतिहासिक विभूति के रूप में श्रीराम के अस्तित्व पर ही संदेह प्रकट कर दिया। इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग के बाद सत्य की प्रतिष्ठा के लिए कई तर्क दिए जाने की आवश्यकता है।
पहला, संसार की ज्यादातर महान धार्मिक विभूतियों के 'ऐतिहासिक' साक्ष्यों को खोजना बेहद मुश्किल है, खासतौर से उनके जो प्राचीनता के कुहासे में विलीन हो चुकी हैं। यह कोई पीएचडी के शोध प्रबंध का विषय नहीं है। यह ऐसा मामला है जो संसार भर के करोड़ों लोगों के विश्वासों और मनोभावों का विषय है। इसके अलावा अयोध्या, जनकपुरी, रामेश्वरम और धनुष्कोटि सहित भारत और श्रीलंका में ऐसे बहुत से स्थान हैं जो श्रीराम के जीवन के घटनाक्रम के साथ अंतरंग रूप से जुड़े हैं। इतिहासकार अब यह स्वीकार करने लगे हैं कि ऐसे 'मिथकों तथा आख्यानों' और वास्तविक घटनाओं के बीच अक्सर बहुत गहरा रिश्ता होता है। यानी मिथक सिर्फ कल्पना की उपज नहीं होते, जैसा कि कुछ लोग मानते हैं। ये वास्तविक प्रसंगों से ही जुड़े हैं, चाहे उसके स्पष्ट सबूत न मिलें।
दूसरा, महर्षि वाल्मीकि की मूल रामायण से लेकर कंब की महान तमिल कृति और तुलसीदास के अमर काव्य रामचरितमानस तक संसार की लगभग सभी भाषाओं में रामकथा सैकड़ों बार कही और दोहराई गई है। श्रीराम के जन्म से शुरू होकर सीता से विवाह, चौदह वर्ष के वनवास, लंका के राजा रावण के साथ उनके निर्णायक युद्ध और विजय के बाद अयोध्या लौटने तक की यह अत्यंत मनमोहक कथा दुनिया भर के असंख्य हिन्दुओं के मानस पटल पर अमिट रूप से अंकित है। यह उनके लिए उतनी ही सच्ची और वास्तविक है जितना कोई भी तथाकथित ऐतिहासिक प्रसंग हो सकता है। रामायण और महाभारत के बारे में 'भारत एक खोज' में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, 'मैं इन ग्रंथों के सिवाय कहीं भी किसी ग्रंथ को नहीं जानता, जिसने जनमानस पर इतना अविराम और व्यापक प्रभाव डाला हो। दूरस्थ इतिहास से चले आ रहे ये ग्रंथ अब भी भारतीय जनमानस की जीवनी शक्ति हैं। चंद बुद्धि विलासों को छोड़कर ये न केवल संस्कृत, बल्कि अनुवादों एवं रूपांतरों तथा असंख्य प्रथाओं की भी जीवन शक्ति हैं, जिनमें स्मृति, हिन्दू धर्मशास्त्र और आख्यान विस्तीर्ण हुए। ये ग्रंथ सांस्कृतिक विकास के विविध सोपानों के लिए श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों से साधारण अनपढ़ और निरक्षर ग्रामवासियों तक सबको एक साथ पोषित करने वाली विशुद्ध भारतीय पद्धति का निरूपण करते हैं। ये हमें बहुविध विभाजित और जातियों में वर्गीकृत बहुरंगी समाज को एकजुट रखने, उनके बिखरे स्वरों को समस्वर करने का रहस्य बताते हैं और उन्हें उदात्त परंपरा तथा नीतिपरक जीवन-यापन की एक साझी पृष्ठभूमि प्रदान करते हैं। जनसाधारण के बीच इन्होंने वैचारिक रूप से दृष्टिकोण का सामंजस्य कायम करने का यत्न किया, जिसे वर्तमान रहना ही था और भिन्नता को बेअसर करना ही था।'
तीसरा, सिर्फ भगवान श्रीराम ही नहीं, बल्कि महासती सीता, आज्ञाकारी भाई लक्ष्मण और आकाश विचरण करने वाले महावीर हनुमान सहित रामकथा के कितने ही पात्र समय के आरपार जनसाधारण की चेतना में गहराई तक रचे-बसे हैं। हर वर्ष विजयादशमी पर्व में रामकथा का अभिनय तथा प्रदर्शन हजारों जगहों पर रामलीलाओं के रूप में अपने चरमोत्कर्ष पर होता है। दक्षिण भारत की तुलना में यह भले ही उत्तर भारत में अधिक प्रचलित हो, लेकिन इस बात से इसका महत्व कम नहीं हो जाता। दक्षिण भारत में कार्तिकेय, अयप्पा और शिव-नटराज की आराधना ज्यादा प्रचलन में है। इसी तरह पूर्व में भगवान जगन्नाथ की आराधना और दुर्गा पूजा का जोर रहता है, लेकिन ये क्षेत्रवार या भौगोलिक फर्क कोई मायने नहीं रखते, क्योंकि इन सभी देवों में हिन्दुओं की गहरी आस्था कायम रहती है। श्रीराम हम सबके आराध्य हैं।
विलक्षण बात यह है कि रामकथा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। इसकी सुगंध सुदूर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैली हुई है। दुनिया में धार्मिक उपासना का सबसे विशाल स्थान है कंबोडिया स्थित अंकोरवाट का भव्य मंदिर। इसकी भित्तियों पर जो शानदार मूर्तिकला उकेरी गई है, उसमें पूरी रामकथा और महाभारत समाई हुई है। इंडोनेशिया में आमतौर पर मुस्लिम कलाकार रामलीलाओं का बड़ी शालीनता और भावुकता के साथ प्रदर्शन करते हैं, जो मन को छू लेता है। हमारे यहां की रामलीलाओं से ये ज्यादा भव्य और श्रेष्ठ होती हैं। थाइलैंड का राज परिवार अपने आप को राम-वंश कहता है। यहां अयोध्या नामक एक तीर्थ स्थल भी है। ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, क्योंकि रामकथा कई महाद्वीपों तक फैली है। कई संस्कृतियों में इसके असर मौजूद हैं और गैर हिंदू भी इससे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। ब्रिटिशों ने पृथ्वी के सुदूर छोरों पर बंधुआ मजदूर भेजे, जिनके वंशज अब फीजी, मॉरीशस, गुयाना और सूरीनाम में बसे हुए हैं। इन लोगों के लिए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सहारे का एकमात्र स्त्रोत रामचरितमानस ही है। पूरी पृथ्वी पर इन देशों तथा अन्य देशों के हिन्दू, मर्यादा पुरुषोत्तम आदर्श मानव के रूप में भगवान के अवतार श्रीराम का ही ध्यान करते हैं। जब गांधीजी ने आदर्श समाज की परिकल्पना की थी, तब उन्होंने रामराज्य का ही आह्वान किया था और अंतिम समय उनके मुख से 'हे राम' ही निकला था। इन उदाहरणों से हमें पता चलता है कि राम हमारे जीवन में किस तरह समाए हुए हैं कि उनके बिना भारतीय जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। श्रीराम को हम भारतीय मानस के प्रतीक पुरुष कह सकते हैं।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का वह हलफनामा न केवल पूरी दुनिया के हिन्दुओं, बल्कि हमारी विलक्षण बहुलतावादी सांस्कृतिक विरासत के लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण, अनुचित और अपमानजनक था।

राम के नाम पर

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके नेता करूणानिधि को यह अधिकार किसी ने नहीं दिया कि वे राम के बारे में वैसी भाषा और फिकरेबाजी का प्रयोग करें जैसा करने की आदत उनकी जैसी सोच वालों को अपनी विचारधारा के गुरू रामस्वामी नायकर पेरियार के आंदोलन के जमाने से रही है। अगर रामस्वामी पेरियार अपने आंदोलन को विज्ञानवादी और तर्कसम्मत साबित करने के अति उत्साह में राम का उस हद तक घोर अपमान करने में सफल हो पाए कि जिसका शब्दों में बखान करना भी आज के वैज्ञानिक युग में असभ्यतापूर्ण लगता है, तो इसलिए कि उस समय भारत में साम्राज्यवादकालीन सोच का ही देश के जनमानस पर असर था, और पेरियार जो चाहते थे, वे कर गुजरे। पर आज भारत लोकतंत्री सोच और लोकतंत्री सक्रियता से एकाकार हो चुका है। एक जिम्मेदार नेता होने के नाते करूणानिधि को इस बात का अहसास होना चाहिए कि उनके लिए क्या बोलना ठीक है और क्या नहीं। क्या राम एक सिविल इंजीनियर थे, और थे तो किस कॉलेज से पढ़कर आए थे, रामसेतु के संदर्भ में जो तिरस्कारपूर्ण सवाल उन्होंने पूछे हैं, तो वही पलटकर उनसे भी पूछ सकता है कि अपने मुख्यमंत्री काल में आपने जो सड़कें बनवाईं, पुल बनवाए, नई बस्तियां बसाई, तो क्या उसके लिए आपको किसी कॉलेज से सिविल इंजीनियर होना जरूरी था? यानी ऐसे सवाल बेमतलब के तो हैं ही, उस वितृष्णा की अभिव्यक्ति भी हैं जो करूणानिधि के मन में राम और रामकथा को लेकर बनी हुई है। एक भारतीय नागरिक होने के नाते उन्हें अपनी हर वितृष्णा को पालने-पोसने का संवैधानिक अधिकार हासिल है। पर दूसरे की आस्था को हानि पहुंचाने में समर्थ इन वितृष्णाजनित तिरस्कार भरी अभिव्यक्तियों का अधिकार नहीं है। वे एक प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और केंद्र की यूपीए सरकार का एक महत्वपूर्ण घटक हैं, इसलिए खुद को संयत करने का जितना दायित्व उनका है, उतना ही दायित्व प्रधानमंत्री का भी है कि वे देखें कि उनकी सरकार का कोई घटक धार्मिक विद्वेष फैलाने का दोषी न बनने पाए।

राम नाम की लूट में बुद्धि गई कहीं छूट



पुरानी कहावत है कि सारी रामायण बांचने के बाद यह पूछना, ‘राम कौन था?’ अपनी जन्मजात बेवकूफी का विज्ञापन ही समझा जा सकता है। ऐसा ही कुछ अपने प्यारे हिन्दुस्तान की कट्टरपंथी धर्मनिरपेक्ष सरकार करती नजर आ रही है। सेतु समुद्रम्‌ परियोजना को लेकर जो हलफनामा केन्द्र सरकार की तरफ से पहले सर्वोच्च न्यायालय में पेश किया गया और फिर जनाक्रोश भड़कता देख जैसी कलाबाजी विद्वान समझे जाने वाले कानून मंत्री ने खाई, उस सबको देखते शक-शुबहे की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती।
अटपटी बात सबसे पहले। भारद्वाज साहब ने जिन शब्दों में बगलें झांकते अपने हाथ झाड़ने की कोशिश की है वह हास्यास्पद ही नहीं, तरस खाने लायक भी है। ‘राम हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। उनका अस्तित्व हम नकार नहीं सकते और न ही मुकदमे का विषय बना सकते हैं। राम की वजह से सारी दुनिया ‘एक्जिस्ट’ करती है। हिमालय-हिमालय है, गंगा-गंगा है वैसे ही राम-राम है’। इन सब बातों को मजाक में नहीं लिया जाना चाहिए। हिमालय को देवात्मा कहने का दुस्साहस हिन्दू कवि कालिदास कर सकता हो, आज हमें अपनी भलाई इसी में नजर आती है कि हिमालय को सिर्फ भौगोलिक रूप में भौतिक वास्तविकता के रूप में पहचाना जाए- बर्फ से ढकी ऊंची पर्वतमाला, जिससे जीवनदायिनी नदियां बह निकलती हैं गंगा सरीखी।
गंगा के बारे में भी यह एहतियात बरतने की जरूरत है कि इसका जिक्र किसी पाप धोने वाले मजहबी रस्मो-रिवाज के सिलसिले में न किया जाए। इसे हमारी गलती न समझा जाए कि हजारों साल से तीर्थराज कहलाने वाले शहर में गंगा तट पर कुंभ मेला जुटता रहा है, जिसका जिक्र चीनी और अरब यात्री इन्हें महत्वपूर्ण समझ कर करते रहे। राम की बात निराली है, जब ऐतिहासिकता ही विवादों के दायरे में है तब ‘एक्जिस्टेंस’ ‘इमेजनरी’ ही समझा जा सकता है। पता नहीं भारद्वाज साहब की और उनके वक्तव्यों के मसौदे तैयार करने वालों की कितनी रुचि दर्शनशास्त्र में है, वरना शायद यह याद दिलाने की जरूरत न पड़ती कि दार्शनिक दकार्ते ने एक बार कहा था ‘मैं सोचता हूं इसीलिए मेरा अस्तित्व है’।
वास्तविक और काल्पनिक यथार्थ तथा साझे के कपोलकल्पित यथार्थ को इस तरह सिरे से खारिज करना खतरनाक है। एक चुलबुले अंग्रेजी पत्रकार ने अपने स्तंभ में ‘रियलिटी’ और ‘हाईपर रियलिटी’ वाली बहस शुरू कर भी दी है। ‘वर्चुअल रियलिटी’ का फुटनोट हमारे कानून मंत्री को और भी नागवार गुजरेगा। लीपापोती करने वाले अंदाज में जो दूसरा हलफनामा पेश किया गया है, उससे बात सुधरी नहीं बिगड़ी ही है। सरकार ने अपनी दरियादिली का परचम फहराते हुए यह दिखलाने की कोशिश की है कि वह सेतु समुद्रम परियोजना और राम के अस्तित्व के बारे में पुनर्विचार इसलिए कर रही है कि उसका मिजाज जनतांत्रिक है और वह जनभावना का तिरस्कार नहीं करती। साथ ही यह भी जोड़ा गया है कि वह सभी धर्मों का आदर करती है खासकर हिन्दू धर्म का।
अल्पसंख्यक सिख समुदाय के प्रधानमंत्री ने इस प्रवचन में हाथ बंटाते हुए यह याद दिलाया कि राम का उल्लेख सिखों की गुरबाणी में भी मिलता है। कबीर धर्मनिरपेक्ष भारत में प्रगतिशील लोगों को सूर, तुलसी, मीरा से ज्यादा रास आते हैं, उनकी पक्तियां भी याद दिलाने लायक है-
‘कबिरा कूता राम का मुतिया मेरो नांउ,
गले राम की जेबड़ी जित खींचे तित जाउं’!
राम की ऐतिहासिकता पर इतना बखेड़ा ही पैदा न होता अगर अपने आकाओं को खुश करने की इतनी चापलूस उतावली न होती। इन पंक्तियों का लेखक बार-बार इस केन्द्र सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण की बात उठाता रहा है। इसी सिक्के का दूसरा पहलू है बहुसंख्यक हिन्दुओं की आस्था का जानबूझ कर तिरस्कार। यह निर्विवाद है कि हिन्दू धर्म को धर्मनिरपेक्ष राज्य में कोई खास स्थान नहीं दिया जा सकता। कम से कम हिन्दुओं की आस्था किसी और धर्म के अनुयायियों की आस्था की तुलना में कम संवेदनशील और महत्वपूर्ण नहीं समझी जा सकती।
कानूनमंत्री तमाम व्यस्तताओं के बावजूद यह भूले न होंगे कि अपने विश्वास के अनुसार आस्था-उपासना के बुनियादी अधिकार को संविधान का संरक्षण प्राप्त है और भारतीय दंडसंहिता में धार्मिक-सांप्रदायिक आक्रोश भड़काना एक दंडनीय अपराध। जिस तरह गुरुओं और पैगंबरों के बारे में सरकारी सार्वजनिक घोषणाओं में संयम बरतने की जरूरत है, वैसा ही संयम राम, कृष्ण, गणेश और सरस्वती के बारे में भी अपेक्षित है।
रही बात इस सरकार के जनतांत्रिक मिजाज की, वह तो साफ नजर आ रहा है पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के कुछ अफसरों के निलंबन से। गुस्से की गाज उन बेचारों पर गिर चुकी है। अब विधिमंत्री कंधे उचका कर यह कह सकते हैं और क्या चाहते हैं आप सजा दे तो दी। दुर्भाग्य से हमारे सार्वजनिक जीवन में रामायण के फिकरों का अवसरवादी ढंग से इस्तेमाल इनका बुरी तरह अवमूल्यन करा चुका है- ‘अग्नि परीक्षा’ हो या ‘लक्ष्मण रेखा’, ‘लंका दहन’ हो या और कुछ। सेतु समुद्रम्‌ परियोजना की मूल प्रेरणा क्या है? क्या यह सच नहीं कि दैत्याकार फिजूलखर्ची वाला यह अभियान सिर्फ सहयोगी-समर्थक तमिल पार्टियों को खुश करने के लिए, मुंहमांगा मोल चुकाने के लिए साधा जा रहा है?
क्या यह सच नहीं कि इसीलिए इस मंत्रालय पर अपना कब्जा बनाए रखने का हठ थिरू करुणानिधि पाले रहते हैं? इस पूरे प्रोजेक्ट का परीक्षण पर्यावरण पर इसके प्रभाव के संदर्भ में लाभ-लागत की दृष्टि से किया जाना चाहिए। पर्यावरणविद यह सवाल उठा चुके हैं कि समुद्र सेतु भले ही मानव निर्मित न हो, एक प्राकृतिक संरचना ही हो पर यह हमारे देश के पूरबी तट को सुनामी जैसी आपदाओं के विनाश से बचाने में कवच का काम करती है।
एक कहावत गांव देहात में आम है ‘राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट’। फिलहाल यह लूट-मार जारी है। मन करता है कहें- राम को राम ही रहने दो दूजा नाम न दो। साध्वी उमा भारती ने जो सलाह आडवाणी जी को दी है उस पर बाकी राजनेताओं को भी अमल करना चाहिए। राम की चर्चा राजनीति के अखाड़े के बाहर जानकार लोगों को ही करने दें।
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