देश में भले ही विस्फोट हो जायें या हत्याएँ, हमारे गृहमन्त्री की ओर से कोई बयान नहीं आता। ज्यादा ही जानें जाती हैं, तो कह देते हैं 'पैनिक' होने की जरुरत नहीं। और इस देश की जनता 'पैनिक' होने का अर्थ समझती ही नहीं है।
वैसे भी जाने क्यों जनता ने सदियों से अपनी सुरक्षा पर कभी ध्यान दिया ही नहीं। इतने बडे़ देश को मात्र शादी-ब्याह और पर्व त्योहार का शौक है। सुरक्षा की ओर से जनमानस विमुख रहा है| जब पृथ्वीराज के पूर्व या पश्चात भी बाहरी आक्रमणकर्त्ता आते थे, लोग लूट जाते थे। जैसे वे लुटने की नियति मान बैठे हों, इतनी निष्क्रियता सोच सच से मुँह मोड़ने की प्रथा इसी देश में है।
वैसे भी भारत अग्रेजो को द्वारा 'उपमहाद्वीप' नाम दिया गया है। इसके देश की मान्यता यही है कि यह कई देशों का समूह है; जबकि भारत एक राष्ट्र है। उस पर हमारे कर्त्ताधर्त्ताओं को एक चुनाव के बाद अगले चुनाव की चिन्ता रहती है और वे राष्ट्रा का उच्चारण नहीं करते।
देश का मीडिया अक्सर ही फिल्मी सितारों के शादी-ब्याह, पर्टी व जेल जाने पर ज्यादा ध्यान देता है। मीडियावालों को भी देश की सुरक्षा नहीं दिखती।
जम्मू में तो खूख्वार आतंकवादी जरा-सी बात पर हड़ताल कर देते हैं। सैनिको पर हमला करके उनका जान तक ले लेते हैं यहाँ आतंकवादियों को विशेष सुविधा सरकार देती है देश की सुरक्षा में सेंध लगानेवालों को कोई पुरस्कार देने की सोच रही है, तभी तो कासकर, हसीना पारकर और अफजल जैसे हमलावरों को विशेष दर्जा प्राप्त है।
हमारे सरकार की सक्रियता का इसी उदाहरण से पता चलता है कि मुम्बई लोकल व मालेगाँव इत्यादी विस्फोट के हफ्तों बीत जाने पर एस.टी.एफ. प्रमुख की बडी़ महान खोज का पता चला कि विस्फोट में आर.डी.एक्स. का उपयोग किया गया था। फिर जाँच किधर गयी, पता ही नहीं चलता। गृहमन्त्रालय की सुस्ती कभी नहीं टूटती। हफ्तों गुजर जाते हैं कुत्ते ही सुँघाते रहते हैं और तब तक दुसरा विस्फोट हो जाता है।
कम से कम अमेरिका, जर्मनी, रुस, ब्रिटेन जैसे पश्चिम राष्ट्रो से सीखना चाहिये कि वहाँ कितनी तेजी से आतंकी को दबोचा जाता है। हमारे यहाँ तो इस कदर आँखों मे धूल झोंकी जा रही है कि कब कैसे आतंकी को छोड़ते हैं, पता ही नही चलता। आतंकवाद से झुलस रहे इतने बडे़ राष्ट्र को न आतंक की परवाह है और न असम में हो रही हत्याओं की, न ही नक्सली हत्याओं की। दाउद के गुर्गे मुम्बई में वसूली करें। जमीन खरीदें। अबु सलेम अपनी राजनीतिक पार्टी बना कर हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री बनने का सपना देखे। चीन अपनी सड़कें-बाँध बनाये। नेपाल हमारी जमीन दबा ले। बांग्लादेशी घुसपैठीये मुम्बई तक घुस आयें इनके हिन्दुस्तानी आका वोटीग कार्ड और राशन कार्ड बनाकर दे और हमारी सरकार आतंकी की माफी देने में चिन्तामग्न रहे। सरकार आतंक निरोधी कानून का विरोध करे। उन कानून को हटा दे। ऎसा तो इसी देश में हो सकता है। नेताओ के गलतियाँ से जनता को कोई लेना देना नही है वह तो अपनी मस्ती में मस्त है। सरकार तो क्या बुद्धिजीवी भी अपने इनामों से खुश हैं। इस देश में भी कोई 'कोंडिलिजा राईज' होनी चाहिए । आई.एस.आई. सिर्फ नकली नोट द्वारा ही नहीं, आग की जलती तीली से भी सब कुछ खाक किये जा रहा है और जो इस ओर अबाज उढाता है उसे साम्प्रदायिक काहा जाता है। सोचो ये देश कहा जा रहा है।
देश कहा जा रहा है!
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2 comments:
अरै जाएदा भइया, जहां जात ह, ठीकै जाई। एतना काहे आकुल-व्याकुल होत हउवा। सब ठीक होइ जाई। बस बराबर ऐही तरे लिखत रहा...जोर लगाइके हइसा....
ye sab CPIM ke logho ki chal hai bandhu.........rastra ke liye koi fikr nahi.........rastra tutane ki kagar par hai
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