कन्नूर कम्युनिस्ट पार्टी का घिनौना चेहरा

केरल का कन्नूर जिला मा‌र्क्सवाद हिंसा से सुलग रहा है। कन्नूर भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना स्थली है, जिसे मा‌र्क्सवादी गर्व से 'भारत का लेनिनग्राद' कहते है। कन्नूर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य 1943 में प्रारंभ हुआ और तब से ही माकपा का दुर्ग माने जाने वाले इस क्षेत्र में हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों के कार्यकर्ताओं पर माकपाई हिंसा जारी है। संघ की बढ़ती साख से घबराए मा‌र्क्सवादियों ने 1969 में एक संघ कार्यकर्ता की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी थी। 1994 में पेशे से शिक्षक और संघ के कार्यकर्ता 35 वर्षीय जयकृष्णन को कन्नूर के एक स्कूल में विद्यार्थियों से भरी कक्षा में काट कर मार डाला गया था। वे छात्र शायद ही उम्र भर उस वीभत्स कांड को भूल पाएंगे। पिछले चालीस सालों में 250 से अधिक लोग माकपाई हिंसा में मारे गए है। सैकड़ों जीवन भर के लिए विकलांग कर दिए गए। बर्बरता ऐसी कि मृतकों या घायलों के चित्र मात्र देख आत्मा सिहर उठे।
कन्नूर से त्रिशूर और कोट्टयम से तिरुअनंतपुरम तक संघ, भारतीय जनता पार्टी, विहिप, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ आदि हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों के कार्यकर्ता मा‌र्क्सवादी गुंडों के निशाने पर है। इसके विरोध में जब हाल में माकपा के दिल्ली स्थित मुख्यालय पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए भाजपा कार्यकर्ता एकत्रित हुए तो उन पर मुख्यालय के अंदर से पथराव किया गया। बर्बर हिंसा के बल पर अपना वर्चस्व कायम करने के अभ्यस्त मा‌र्क्सवादी कन्नूर हिंसा पर खेद प्रकट करने की जगह संसद में भी सीनाजोरी कर रहे है। संसद में हंगामा खड़ा कर वे कन्नूर की हिंसा को छिपाने की कोशिश में लगे है। उनका यह पैंतरा नया नहीं है। अभी कुछ समय पूर्व ही पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में सरकार समíथत जिस तरह मा‌र्क्सवादी कामरेडों द्वारा बड़े पैमाने पर हिंसा की गई थी उसे भी देश और मीडिया की नजरों से छिपाने की पूरी कोशिश की गई थी। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने तब इस हिंसा की कड़ी आलोचना करते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा किया था। केरल के हिंसाग्रस्त कन्नूर जिले की असली तस्वीर क्या है, यह केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी. कुमार की टिप्पणी से स्पष्ट है। उन्होंने कहा है, '''सरकार और पुलिस के समर्थन से की गई यह हिंसा दिल दहलाने वाली है।''' उन्होंने पुलिस की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा, ''पुलिस का नया चेहरा देखने को मिला, वह एक पार्टी विशेष के नौकर की तरह काम कर रही है..हिंसा रोकने का एकमात्र विकल्प कन्नूर को केंद्रीय सुरक्षा बलों के हवाले करना है।'' व्यवस्थातंत्र पर मा‌र्क्सवादी कार्यकर्ताओं के शिकंजे का यह अपवाद नहीं है।
सत्तार के दशक में पश्चिम बंगाल की कांग्रेस-कम्युनिस्टों की मिली-जुली सरकार में शामिल मा‌र्क्सवादियों ने अपनी कार्यसूची और भूमि सुधार कानूनों को लागू करने के लिए बड़े पैमाने पर राज्यवार हिंसा का दौर चलाया था। प्रशासन और पुलिस का राजनीतिकरण करने के कारण 1977 में मा‌र्क्सवादियों को अपना वर्चस्व कायम करने में बड़ी मदद मिली। इस मा‌र्क्सवादी हिंसा के विरोध में तब कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजय मुखर्जी अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे थे। यह स्थापित सत्य है कि जो भी व्यक्ति या संगठन मा‌र्क्सवादी विचारों से सहमत नहीं होते उन्हे मा‌र्क्सवादी सहन नहीं कर पाते। दिल्ली में माकपा का एक चेहरा है तो पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में अलग। नंदीग्राम की हिंसा बताती है कि अपने विरोधियों से निपटने के लिए मा‌र्क्सवादी किस हद तक जा सकते है।
साठ के दशक से पूर्व और उसके बाद सत्ता हथियाने के लिए कम्युनिस्टों ने हिंसा का किस तरह सहारा लिया, यह सर्वविदित है। तीस के दशक में छिटपुट हिंसा की घटनाओं के साथ ये देश भर में आंदोलन खड़ा करने में क्षणिक रूप से सफल हुए थे, किंतु कांग्रेस प्रमुख राजनीतिक पार्टी बनी रही और मजदूर संघों में राष्ट्रवादी ताकतों का वर्चस्व रहा। 40 के दशक में कम्युनिस्टों को सुनहरा अवसर मिला। ब्रितानियों के खिलाफ राष्ट्रवाद के उफान के दमन पर वे ब्रितानियों के संग हो लिए। बड़े पैमाने पर राष्ट्रवादी नेता जेल में कैद थे। इससे कम्युनिस्टों को भारतीय राजनीति, खासकर मजदूर संघों में सेंधमारी करने का उपयुक्त अवसर मिला। 1964 में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ वैचारिक प्रश्नों पर हुए वाद-विवाद में पी. सुंदरय्या, एके गोपालन, हरिकिशन सिंह सुरजीत आदि कम्युनिस्ट नेताओं ने लिखा था, ''हमारे देश में शांति के पथ को अपरिहार्य बताना अपने आप को और दूसरों को धोखा देना है।'' 1964 का यह दस्तावेज, जो माओ की हिंसक क्रांति पर आधारित था, वास्तव में अंतत: सीपीआई के उद्भव का आधार बना।
तब से लेकर आज तक मा‌र्क्सवाद का यह घटक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आने के बावजूद लगातार अपनी गतिविधियों से यह प्रमाणित करता रहा है कि विरोधी स्वर को दबाने के लिए वह हिंसा के किसी भी स्तर तक उतर सकता है। हिंसा और दमन का विरोध करने वाले केरल के केआर गौरी और पश्चिम बंगाल के मोहित सेन जैसे कामरेडों को इसीलिए धक्के मार निकाल बाहर किया गया था। पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में कम्युनिस्टों का जो प्रभाव है वह उनकी हिंसा की राजनीति के बल पर ही स्थापित हुआ है। कन्नूर मा‌र्क्सवादियों के वर्चस्व वाले उत्तारी मालाबार का मुख्यालय है। नंदीग्रामवासियों की तरह मालाबार के लोग भी अब मा‌र्क्सवाद के विरोध में मुखर हो उठे है। कथित मा‌र्क्सवादी शहीदों के नाम पर जनता से धन उगाही, आतंकवाद को समर्थन, छिटपुट व्यापार से लेकर भवन निर्माण तक में मा‌र्क्सवादी पार्टी की तानाशाही, नागरिकों से आय के हिस्से से पार्टी के लिए चंदे की वसूली, रोजगार में माकपा कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता जैसे दमन व शोषण के अनगिनत कार्यो के खिलाफ मालाबार की जनता अब उठ खड़ी हुई है। मा‌र्क्सवादी विचारधारा के खिलाफ आम आदमी का यह विद्रोह मा‌र्क्सवादियों के लिए असहनीय है। वस्तुत: राष्ट्रवादी विचारधारा से कोसों की दूरी होने के कारण भारतीय जनमानस में मा‌र्क्सवाद अपनी पैठ नहीं बना पाया है। इसीलिए मा‌र्क्सवादी अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए हिंसा का सहारा लेते है। उन्हे पता है कि वर्ग-संघर्ष की दुकानदारी भारत में नहीं चल सकती।
साम्यवाद दुनिया भर से सिमटता जा रहा है। ऐसे में मा‌र्क्सवादियों को अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा राष्ट्रवादी ताकतों से लगता है। आश्चर्य नहीं कि भाजपा और संघ परिवार मा‌र्क्सवादियों के निशाने पर रहते है। यह सही है कि हिंसा के बदले हिंसा भारतीय परंपरा की पहचान नहीं है, किंतु अनवरत हिंसा का प्रतिकार क्या हो सकता है? हिंसा? अंततोगत्वा सभ्य समाज को ही भारत की बहुलतावादी परंपरा की रक्षा के लिए मा‌र्क्सवादियों की हिंसा के खिलाफ गोलबंद होना होगा। कन्नूर की ये दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं मा‌र्क्सवादी विचारधारा में कोई अपवाद नहीं है। कम्युनिस्टों को हिंसा के माध्यम से अपनी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के दमन और प्रताड़ित करने का विश्वव्यापी अनुभव है। सोवियत संघ से लेकर, कम्युनिस्ट चीन, कंबोडिया, क्यूबा में करोड़ों निर्दोषों की हत्या कम्युनिस्टों के रक्तरंजित इतिहास में दर्ज है। यदि कन्नूर में फैली इस हिंसा को समाप्त नहीं किया गया तो यह कालांतर में दावानल बन सकता है।

तिब्बत और फिलीस्तीन

इन दिनों तिब्बत चर्चा में है। वैसे तो इसके पीछे जो कारण है उसे लेकर तो तिब्बती भी प्रसन्न नहीं होंगे पर दशकों उपरांत ऐसा अवसर जरूर आया है जब तिब्बत का विषय एकदम से वैश्विक मह्त्व का हो गया। हम यहाँ इस विषय पर चर्चा नहीं करना चाह्ते कि तिब्बत के इस विषय के मह्त्वपूर्ण होने के पीछे प्रमुख कारण क्या है वरन हम एक समानता की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाह्ते हैं जो न केवल रोचक है वरन उसके गम्भीर राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। साथ ही यह विषय कहीं न कहीं जाकर उन नारों से भी जुड्ता है जिसे विभिन्न संगठन या राजनीतिक दल समय-समय पर अपनी सुविधा के अनुसार गला फाड्-फाड् कर लगाते हैं। ऐसा ही एक नारा मानवाधिकार का है जो विश्व भर के वामपंथियों का सबसे प्रिय विषय है। यह वामपंथियों के हाथ में वह छडी है जिससे वे जब चाहे जिसे चाहे मारते रह्ते हैं। इस नारे रूपी छडी का सर्वाधिक उपयोग इन वामपंथियों ने सबसे अधिक इजरायल या फिर हिन्दूवादी शक्तियों के लिये किया है। परंतु तिब्बत में जो कुछ भी हो रहा है उसे लेकर उनका जो भी रूख है वह उनके बौद्धिक आडम्बर को अनावृत करने के लिये पर्याप्त है।

तिब्बत में चीन का दमन इन छद्म बुद्धिजीवियों को मानवाधिकार का हनन नहीं चीन का आंतरिक मामला लगता है तो फिर यह सिद्धांत इजरायल पर लागू क्यों नहीं होता। या फिर गोधरा की प्रतिक्रिया में गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगों को लेकर जब विभिन्न वामपंथी संगठन गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को विश्व के विभिन्न मंचों पर बदनाम कर रहे थे और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से दखल देने की मांग कर रहे थे तो इनका आंतरिक मामले का सिद्धांत कहाँ चला गया था। यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर खोजने का प्रयास हम अपने लेख में कर रहे हैं।

तिब्बत और फिलीस्तीन में किस मामले में समानता है तो वो यह कि फिलीस्तीन भी दावा करता है कि वह अपनी स्वाधीनता की लडाई लड रहा है। लेकिन क्या तिब्बत को विश्व मंच पर वह स्थान कभी मिल सका या उसकी आवाज कभी सुनी गयी। आखिर क्यों नहीं। ऐसा क्यों हुआ जबकि तिब्बत वास्तव में 14,000 पुराना एक राष्ट्र है जिसकी अपनी संस्कृति और अपना धर्म है। जब कि इस मुकाबले फिलीस्तीन की तुलना करें तो वह इन सन्दर्भों में कभी राष्ट्र नहीं रहा। वह बीसवीं शताब्दी के लम्बे समय तक इजरायल का ही हिस्सा था और फिलीस्तीनियों को फिलीस्तीनी यहूदी कहा जाता था। फिलीस्तीनियों का इस्लाम से पृथक ऐसा कोई धर्म भी नहीं था जैसा कि तिब्बत के मामले में है। फिर भी समस्त विश्व में फिलीस्तीन की छवि एक ऐसे देश के निवासियों के रूप में है जिन्हें अपने देश से निकाल दिया गया है और उनके देश पर आक्रांता इजरायल ने कब्जा कर रखा है। इस सहानुभुति का कारण क्या है। इसके कुछ कारण मोटे तौर पर ये नजर आते हैं-

फिलीस्तीन ने अपनी लडाई के लिये आतंकवाद का सहारा लिया जबकि तिब्बती शांति के उपासक हैं और सहिष्णु धर्म बौद्ध के अनुयायी हैं।

फिलीस्तीन ने स्वयं को इजरायल से पीडित देश के रूप में प्रस्तुत किया जिसके आधार पर उसे विश्व में ध्रुवीकरण करने में सफलता मिली। फिलीस्तीन को विश्व के प्रायः सभी देशों का समर्थन प्राप्त हो गया क्योंकि यह विषय मुसलमानों से जुडा है और विश्व के सभी देश मुस्लिम तुष्टीकरण को अपनी विदेश नीति का अंग मानते हैं। इसके विपरीत तिब्बत मुस्लिम देश नहीं है इस कारण उसके प्रति सहानुभुति दिखाना किसी की मजबूरी या फैशन नहीं है।

फिलीस्तीन को उन मुस्लिम देशों का समर्थन प्राप्त है जिनके पास तेल की दौलत है और इसके आधार पर वे विश्व् में धाक जमाते हैं और अपने प्रमुख सम्मेलनों में फिलीस्तीन के विषय को इस्लामी उम्मा के स्वाभिमान के साथ जोड्कर इस्लामी जनमानस की भावनाओं को उद्दीप्त करते हैं। जबकि इसके ठीक विपरीत तिब्बत का सहयोग करने को कोई तैयार नहीं है। ले देकर भारत ने तिब्बत की निर्वासित सरकार और उनके धर्मगुरु दलाई लामा को शरण दे रखी है तो वह भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस विषय को उठाने से कतराती है।

फिलीस्तीन के विषय को अधिक प्रमुखता मिलने का एक बडा कारण विश्व बिरादरी की सबसे बडी कानून निर्माता संस्था सन्युक्त राष्ट्र संघ है। समस्त विश्व में इजरायल की अलोकप्रियता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानों कर्मकाण्ड ही बना लिया है कि प्रत्येक बैठक या सत्र में फिलीस्तीन के लिये इजरायल की निन्दा करता हुआ एक प्रस्ताव अवश्य होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के इस रूख से फिलीस्तीन को वैश्विक मान्यता प्राप्त हो जाती है जबकि तिब्बत को पीडित करने वाला देश स्वयं संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य है इस कारण शायद ही कभी संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बत में चीनी अत्याचार पर चर्चा हुई हो।

फिलीस्तीन और तिब्बत की स्थिति में इस अंतर का एक प्रमुख कारण समाचार साधन हैं। विश्व भर के टी वी चैनलों पर ऐसे चित्र और समाचार आते हैं जो फिलीस्तीन को इजरायल द्वारा उत्पीडित देश के रूप में चित्रित करते हैं। फिलीस्तीन के अनेक हिस्सों से समाचार और टी वी छवि आती रह्ती है जिसके आधार पर लोग अपना दृष्टिकोण बनाते हैं। इसके विपरीत तिब्बत में जो कुछ भी हो रहा है उसके बारे में विश्व को उतना ही पता लग पाता है जितना चीन विश्व को बताना चाह्ता है। वैसे यह अजीब विडम्बना है कि जिस देश को वामपंथी रक्त पिपासु सिद्ध करना चाह्ते हैं उसके यहां कम से कम मीडिया पर सेंसर तो नहीं है।

फिलीस्तीन और तिब्बत की स्थिति में अंतर का एक प्रमुख कारण यह भी है कि तिब्बत पर अधिकार करने वाला देश स्वयं वामपंथी या कम्युनिस्ट है जबकि इसके विपरीत फिलीस्तीन का मुद्दा विश्व के समस्त वामपंथियों के लिये प्रमुख विचारधारागत मुद्दा है जो उन्हें आपस में जोड्कर रखता है। विश्व के किसी भी कोने में कोई वामपंथी क्यों न हो उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता की पहचान इसी से होती है कि फिलीस्तीन और इजरायल मसले पर उसका रूख क्या है।
आखिर वह कौन सा कारण है जो कम्युनिस्टों और वामपंथियों को फिलीस्तीन के निकट लाता है और इतना निकट लाता है कि वे यासर अराफात के इंतिफादा या आत्मघाती हमलों में भी कोई बुराई नहीं देखते। उन्हें तो इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वाले भी अपने सहयोगी लगते हैं। ऐसा क्यों?

इसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण भी है। द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत जब शीत युद्ध् आरम्भ हुआ तो साम्यवादियों या वामपंथियों को लगता था कि अब पूँजीवाद ध्वस्त हो जायेगा और पूँजीवाद के अंतर्गत पूँजी पर नियंत्रण की भावना के चलते कर्मचारी और मजदूर असंतुष्ट होंगे और समस्त विश्व में सर्वहारा संग़ठित होकर एक क्रांति को जन्म देगा और रूस का माडल एक स्थाई व्यवस्था बन जायेगा। परंतु ऐसा हुआ नहीं। पूँजीवाद की व्यवस्था के रह्ते हुए भी कर्मचारियों की जेबें भरती रहीं और मजदूर भी सर्वहारा क्रांति से दूर ही रहे। 1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के उपरांत साम्यवाद का आर्थिक दर्शन समाप्त हो गया और उसके अस्तित्व का एकमात्र दर्शन रह गया अमेरिका का विरोध। अपने दर्शन के बूते जब साम्यवादियों में अमेरिका को नष्ट करने की कूबत न रही तो उन्हें इस्लामवादियों में नया साथी दिखाई पडा। इसी कारण उन्होंने 2000 के उपरांत अपने सभी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में इजरायल फिलीस्तीन को अपना सबसे बडा मुद्दा बताते हुए फिलीस्तीन के प्रति अपनी सहानुभुति रखी।

यह कोई संयोग नहीं है कि विश्व के अनेक शीर्ष वामपंथियों ने 11 सितबर 2001 को अमेरिका पर हुए आक्रमण की प्रशंसा तक की है और उसे अमेरिका की नीतियों का परिणाम बताया है।
ऐसा नहीं है कि वामपंथी केवल अमेरिका की निन्दा करते है वही तत्व भारत में इस्लामवादी हिंसा का प्रकारांतर से समर्थन करते हैं और हिन्दूवादी संगठनों पर आरोप लगाते हैं। ये नक्सली हिंसा को प्रश्रय देते हैं और भारत के पडोस में नेपाल में नक्सल और इस्लामवादी गठजोड का एक बडा खतरा इन्होंने खडा ही कर दिया है।

इन समानताओं से यही निष्कर्ष निकलते हैं कि वामपथियों की मानवाधिकार को लेकर ईमानदार नीयत नहीं है और उनके लिये ये केवल नारे हैं जिनका उपयोग वे अवसरवादिता से करते हैं तथा साथ ही वे अब विश्व में अपना वर्चस्व हिंसावादियों के साथ मिलकर बढायेंगे। इस्लामवाद और वामपंथ का यह गठबन्धन आने वाले दिनों में विश्व के लिये नयी चुनौती बनने वाला है।

हिन्दुस्तान के हिन्दुओं ने क्या गुनाह किया है

पिछले दिनों महाशिवरात्रि के अवसर पर श्रीलंका के राष्ट्रपति श्री महिंदा राजपक्षे ने वहाँ की जनता को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म विश्व के महान धर्मो में से एक है और लोगो को हिंदू धर्म के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए क्योंकि हिंदू धर्म के अनुसरण से हम अपना आने वाला कर बेहतर बना सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू धर्म से हमे एकता, भाईचारा और सहिष्णुता की सीख मिलती है जो शान्ति स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है. साथ ही श्री महिंदा ने ये भी कहा कि वो भारत में शांति स्थापित हो इसकी प्रार्थना करते हैं.

हमारा पड़ोसी देश, और वो देश जो ख़ुद दशकों से आतंकवाद से जूझ रहा है के राष्ट्रपति ने महाशिवरात्रि पर हिन्दुओं का प्रोत्साहन किया, हिंदू धर्म को बढावा देने वाली बातें कहीं, हिन्दुओं का मनोबल ऊँचा किया.

हमारे राष्ट्रपति ने क्या किया? प्रधानमंत्री ने क्या किया? क्या हिन्दुओं का मनोबल ऊँचा करने के लिए कोई संदेश आया? क्या हिन्दुओं को प्रोत्साहित किया? अगर ईद होती तो राष्ट्रपति का देश के नाम संदेश आ जाता और प्रधानमंत्री जी तो कहीं ना कहीं किसी ईद समारोह में सिवईयाँ खाने जाते और शायद वहाँ बच्चों को ईदी भी बाँट आते.
यही तो फर्क हो रहा है हिन्दुओं के साथ.सभी क्षेत्रों में हिन्दुओं को नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है. क्यों?बहुसंख्यक होने के बावजूद भी हमे दोयम दर्जे का माना जाता है. क्यों? मुसलमानों के त्यौहार त्यौहार और हिन्दुओं के त्यौहार एक सामान्य दिन. क्यों? अगर अब भी हिंदू जाग्रत नहीं हुए तो वो दिन दूर नहीं जब मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं को गुलाम बनाया जाएगा, उन्हें प्रताड़ित किया जाएगा, हिन्दुओं की अस्मिता के साथ खेला जाएगा और धीरे-धीरे संपूर्ण हिन्दुस्तान को पाकिस्तान में मिला कर देवभूमि हिन्दुस्तान और हिन्दुओं का नाम-ओ-निशाँ हमेशा के लिए इस धरती से मिटा दिया जाएगा. हिंदू जाग्रति समय की मांग और आवश्यकता है. इसीलिए हिन्दुओं जागो और आह्वान करो धर्मयुद्ध का और हिंदू युग का.

कम्युनिस्ट पार्टी का धर्म हिंसा है

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने शांति-प्रयासों का हमेशा स्वागत तथा समर्थन दिया । आगे हिंसा न हो, इस प्रयास में भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेगडी़ तथा दीनदयाल शोध संस्थान दिल्ली के तत्कालीन निदेशक श्री पी.परमेश्वरन ने दिल्ली के वरिष्ट कम्युनिस्ट नेता श्री ई.एम.एस. नम्बुदरीपाद और श्री राममूर्ति से वार्ता की । इसी प्रकार केरल में भी संघ और सी.पी.एम. के नेताओं के बीच वार्तायें हुयीं। लेकिन शांति समझौते के कागज की स्याही सूख्नने से पहले ही संघ स्वयंसेवकों पर बिना किसी उत्तेजना के हमले प्रारम्भ कर दिये गये। शांति बनाये रखने के लिये प्रतिबद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अतिसम्मानित न्यायाधीश कृष्णाय्यर एवं तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री ई.के. नयनार की पहल पर सी.पी.एम. के साथ पुन: बैठकर 1999 में शान्ति प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के लिये सहमत हुआ। परन्तु इस वार्ता के दो दिन बाद ही सी.पी.एम. कार्यकर्ताओं ने भारतिय जनता युवा मोर्चा के राज्य उपाध्यक्ष श्री जयकृ्ष्णन मास्टर की उनके विद्यालय की कक्षा में छोटे-छोटे बच्चों के सामने निर्मम ढंग से हत्या कर दी गई। स्पष्ट है कि शान्ति वार्तायें पूर्णत: असफल एवं अनुपयोगी सिद्ध हुयीं।
फिर भी कुछ वर्षो तक भड़काने के गम्भीर प्रयासों के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शान्ति बनाए रखने की अपनी प्रतिबद्धता पर डटा रहा और कभी प्रतिकार नहीं किया और इसका परिणाम यह हुआ कि संघ को कई अच्छे कार्यकर्ताओं को खोना पड़ा और सी. पी. एम. के कार्यकर्ता और अधिक निर्दयी होते गये। वे जब भी राज्य में आते हैं तो सरकारी मशीनरी की मदद से उनकी निर्दयता सभी सीमायें लाँघ जाती है।
मार्च से शुरु हत्याओं का नवीनतम दौर अब तक पाँच स्वयंसेवकों का जान ले चुका है। 5 मार्च 2008 को शिवरात्रि के दिन थलसेरी शहर में तालुक शारीरिक शिक्षण प्रमुख श्री सुमेश हमेशा से शान्ति वार्ताओं में संघ का प्रतिनिधित्व करते थे। उसी दिन निखिल (22 वर्ष ) नाम के एक दूसरे स्वयंसेवक की जो लांरी क्लीनर था और अपने गरीब परिवार का एकमात्र सहारा था, हत्या कर दी गयी। श्री सत्यन नाम के राज मिस्त्री स्वयंसेवक को उसके कार्यस्थल से अक्षरश: बाहर घसीटकर उसका सिर काट दिया गया । उसके सिर कटे शरीर को उसके घर के निकट सड़क पर फेंक दिया गया । अगले दिन 6 मार्च को कुत्तुमरम्बा गांव के श्री महेश नाम के कार्यकर्ता की हत्या कर दी गयी और सिर धड़ से अलग कर दिया गया, अगले दिन 7 मार्च को कुडिडयेरी के श्री सुरेश बाबू तथा इल्थ्थुजा के श्री के.वी.सुरेन्द्रन (65 वर्ष ) की नि्र्मम हत्या की गई । इस प्रकार तीन दिनो़ में गरीब परिवारों के पांच नौजवान कार्यकर्ता हमसे छीन लिये गये । एक दर्जन से अधिक युवकों का अंग - भंग कर दिया गया। और वे विकलांग हो गये।

राजनीतिक इस्लाम का बढता दायरा

इन दिनों समस्त विश्व में जिस इस्लामवादी खतरे का सामना सर्वत्र किया जा रहा है उसके पीछे मूल प्रेरणा इस्लाम की राजनीतिक इच्छा ही है। समस्त विश्व में मुसलमानों के मध्य इस बात को लेकर सहमति है कि उनके व्यक्तिगगत कानून में कोई दखल ना दिया जाये और विश्व के अधिकांश या सभी भाग पर शरियत का शासन हो। इस विषय में इस्लामवादी आतंकवादियों और विभिन्न इस्लामी राजनीतिक या सामाजिक संगठनों में विशेष अंतर नहीं है। इसी क्रम में पिछ्ले दिनों कुछ घटनायें घटित हुईं जो वैसे तो घटित अलग-अलग हिस्सों में हुईं परंतु उनका सम्बन्ध राजनीतिक इस्लाम से ही था। सेनेगल की राजधानी डकार में इस्लामी देशों के सबसे बडे संगठन आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कन्ट्रीज की बैठक हुई और उसमें दो मह्त्वपूर्ण निर्णय लिये गये जिनका आने वाले दिनों में समस्त विश्व पर गहरा प्रभाव पडने वाला है। इन दो निर्णयों के अनुसार

इस्लामी देशों के संगठन ने प्रस्ताव पारित किया कि समस्त विश्व में विशेषकर पश्चिम में इस्लामोफोब की बढती प्रव्रत्ति के विरुद्ध अभियान चलाया जायेगा और इस्लाम के प्रतीकों को अपमानित किये जाने पर उसके विरुद्ध कानूनी लडाई लडी जायेगी। इस प्रस्ताव में स्पष्ट कहा गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस्लाम के प्रतीकों को अपमानित करने या पैगम्बर को अपमानित करने के किसी भी प्रयास का डट कर मुकाबला किया जायेगा और कानूनी विकल्पों को भी अपनाया जायेगा।

दूसरे निर्णय के अनुसार मुस्लिम मतावलम्बियों को चेतावनी दी गयी कि वे शरियत के पालन के प्रति और जागरूक हों इस क्रम में सऊदी अरब के विदेशमंत्री ने अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हुए घोषणा की कि उनका देश आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कन्ट्रीज के गरीब देशों को एक अरब यू.एस. डालर की सहायता देगा परंतु बदले में उन्हें अपने यहाँ शरियत के अनुसार शासन-प्रशासन सुनिश्चित करना होगा।

ये दोनों ही निर्णय दूरगामी प्रभाव छोडने वाले हैं। पिछ्ले कुछ वर्षों में पश्चिम ने अनेक सन्दर्भों में इस्लाम को चुनौती दी है और विशेष रूप से डेनमार्क की एक पत्रिका में पैगम्बर को लेकर कार्टून छपने के उपरांत पश्चिम में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इस्लाम के विशेषाधिकार को लेकर व्यापक बहस आरम्भ हो गयी। पिछ्ले वर्ष कैथोलिक चर्च के धार्मिक गुरु पोप द्वारा इस्लाम के सम्बन्ध में की गयी कथित टिप्पणी के बाद इस बहस ने फिर जोर पकडा। इस बार इस्लामी सम्मेलन में इस्लाम के प्रतीकों पर आक्रमण की बात को प्रमुख रूप से रेखांकित किये जाने के पीछे प्रमुख कारण यही माना जा रहा है कि इस्लाम पश्चिम की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांत को स्वीकार कर अपने अन्दर कोई परिवर्तन लाने को तैयार नहीं है। आने वाले दिनों में यह विषय इस्लाम और पश्चिम के मध्य टकराव का प्रमुख कारण बनने वाला है। पश्चिम को इस बात पर आपत्ति है कि जब उनके यहाँ सभी धर्मों पर मीमांसा और आलोचना की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आती है तो इस सिद्धांत की परिधि से इस्लाम बाहर क्यों है या उसे विशेषाधिकार क्यों प्राप्त है। इस्लामी देशों ने इस विषय पर अपना रूख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी विशेषाधिकार की स्थिति को कायम रखना चाह्ते हैं। उधर पश्चिम में इस्लाम के विशेषाधिकार को ध्वस्त करने के अनेक प्रयास हो रहे हैं। हालैण्ड की संसद के एक सदस्य और आप्रवास विरोधी राजनीतिक दल फ्रीडम पार्टी के प्रमुख गीर्ट वाइल्डर्स ने कुरान पर अपने विचारों को लेकर एक फिल्म तक बन डाली है जो 28 मार्च को प्रदर्शित होने वाली है। पश्चिम की इस मानसिकता के बाद इस्लामी देशों के सबसे बडे संगठन द्वारा जिस प्रकार का अडियल रवैया अपनाया गया है उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि इस्लामी मतावलम्बी किसी भी नये परिवर्तन के किये तैयार नहीं हैं। इससे तो एक ही बात स्पष्ट होती है कि आने वाले दिनों में पश्चिम और इस्लाम का टकराव बढने ही वाला है।

इस सम्मेलन के दूसरे प्रस्ताव से भी राजनीतिक इस्लाम को प्रश्